Wednesday, December 7, 2016

स्वयं को जानने का एक उदाहरण

जीवन विद्या वर्कशॉप में एक उदाहरण बहुत प्रचलित है। मान लीजिए ए और बी दो आदमी हैं। और हम एक सूची बनाएं कि A अपनी किसी गलती के बारे में क्या सोचता है और B की गलती के बारे में क्या सोचता है। तो लिस्ट कुछ इस तरह बनेगी-

A : मैं एक इनसान हूं। B भी एक इनसान है।
A : मैं भी सुखी रहना चाहता हूं। B भी शायद सुखी रहना चाहता है।
A : मुझसे गलती हो जाती है। B से भी गलती हो जाती है।
A : मुझसे जब गलती होती है तो अनजाने में होती है। B कई बार और शायद ज्यादातर जानबूझकर गलती करता है। क्योंकि वो ऐसा ही है। उसका परिवार ऐसा ही है। उसकी पृष्ठभूमि ऐसी ही है। आदि-आदि।
A : मुझसे गलती हो तो मुझे प्यार से समझाया जाए। बार-बार गलती होने पर भी मुझे अच्छा लगेगा कि मुझे प्यार से ही समझाया जाए। लेकिन गलती होने पर B को डांटा जा सकता है। बार-बार गलतियां होने पर उसे कड़ा दंड दिया जाना चाहिए। और कुछ गलतियों पर तो लगता है कि B बिना दंड दिए मानेगा नहीं।

ये तो 'A' 'B' के बारे में सोचता है। ‘बी’ ए के बारे में क्या सोचता है। शायद एकदम ऐसा ही। अब जरा यहां से ए और बी को हटाकर पहले स्वयं को ए के स्थान पर रखकर देखें। और अपने आसपास ऐसे लोगों के बारे में सोचें जो आपको कभी-कभी या अकसर बी जैसे दिखते हैं। यह बी आपकी पत्नी, आपका बच्चा, आपका पड़ोसी, आपका कोई मित्र,किसी एक धर्म या जाति से ताल्लुक रखने वाला, सड़क पर चलने वाला कोई भी हो सकता है। अब जरा सोचिये कि जिन-जिन लोगों के बारे में आप ऐसे विचार रखते हैं जो ए बी के बारे में रखता है। उनमें से अगर किसी व्यक्ति को एक ही जगह रख दिया जाए तो क्या उसके विचार भी आपके बारे में एकदम वैसे ही नहीं होंगे जैसे आपके थे। यही आपमें और उनमें कॉमन है। इस ओर ध्यान देना है। जितना इस ओर ध्यान देने का अभ्यास होगा उतना हमारी अपने आसपास के सभी बी के बारे में सोच बदलती चली जाएगी। हमारी अपने बारे में सोच बदलती चली जाएगी।

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